महाराष्ट्र की हाल ही में घोषित राज्य मछली, सिल्वर पॉमफ्रेट (चंदेरी पप्लेट या सारंगा), विलुप्ति के कगार पर है. बड़े पैमाने पर अति-मछली पकड़ने और गैर-संवहनीय प्रथाओं ने इस प्रजाति को खतरे में डाल दिया है.
Credit: canva
सिल्वर पॉमफ्रेट की खासियत
सिल्वर पॉमफ्रेट विश्व भर में अपने स्वाद के लिए प्रसिद्ध है. यह मछली महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में पाई जाती थी.
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संरक्षण की मांग और सरकारी कदम
मछुआरे संगठनों की लगातार मांग के बाद राज्य सरकार ने सिल्वर पॉमफ्रेट को राज्य मछली घोषित किया था. मत्स्य विभाग ने इसके संरक्षण के लिए नोटिफिकेशन जारी किया, लेकिन इसका कोई असर दिखाई नहीं पड़ रहा है.
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मछुआरों की चिंता
मछुआरों का कहना है, "छोटी पोमफ्रेट का अंधाधुंध शिकार इस प्रजाति को पनपने से रोक रहा है. मछुआरों को कम उपज और अधिक लागत का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनकी आजीविका को खतरा है."
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आर्थिक नुकसान का खतरा
अत्यधिक मछली पकड़ने से अल्पकालिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम विनाशकारी हैं. युवा मछलियों का शिकार प्रजाति के साथ-साथ मछुआरों की आजीविका को भी खतरे में डाल रहा है.
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आंकड़ों में अंतर
50 ग्राम का पोमफ्रेट ₹1250 प्रति किलोग्राम में बिकता है. लेकिन इसे तीन महीने तक बढ़ने दें, तो 250 ग्राम की मछली ₹1000 प्रति किलोग्राम में बिकती है, जिससे 40 गुना फायदा हो सकता है. मछुआरों की मूर्खता की वजह से इनका अंधाधुंध शिकार हो रहा है.
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आगे की राह
विशेषज्ञों की राय है कि सरकार को युवा मछलियों के शिकार पर सख्त प्रतिबंध लगाना चाहिए. इससे न केवल सिल्वर पॉमफ्रेट का अस्तित्व बचेगा, बल्कि मछुआरा समुदाय की आर्थिक स्थिरता भी सुनिश्चित होगी.