Hezbollah Group: इजरायली सेना IDF और लेबनान स्थित आतंकवादी समूह हिजबुल्लाह के बीच रविवार सुबह बीते कुछ महीनों की सबसे घातक गोलीबारी हुई. जब से फिलिस्तीनी समूह हमास ने सात अक्टूबर को इजरायल पर हमला बोला है तब से हिजबुल्लाह ने फिलिस्तीनी चरमपंथी संगठन का साथ देने की कसम खाई है और साथ ही गाजा में चल रहे इजरायली सैन्य अभियान का विरोध किया है.
रविवार को समूह ने दावा किया कि उसने सैकड़ों रॉकेट के जरिए इजरायल के कई सैन्य बेस को निशाना बनाया है. समूह ने बयान जारी कर कहा कि उसके हमले का पहला चरण पूरी तरह से सफल रहा है. वहीं, इजरायल ने हिजबुल्लाह के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उसने 100 लड़ाकू विमानों के जरिए लेबनानी हमलों को नष्ट कर दिया है. वहीं सेना ने कहा कि वह हिजबुल्लाह के रॉकेट हमलों को हवा में ही नष्ट करने के लिए एहतियातन पूर्व हमले कर रही है.
हालांकि दोनों पक्षों के बीच हुए ताजा हमले ने लंबे समय से शांति की राह तलाश रहे पश्चिम एशिया को गहरे संकट की ओर धकेल दिया है. इजरायल ने सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 48 घंटे के देशव्यापी आपातकाल की घोषणा भी की है.
रिपोर्ट के अनुसार, हिजबुल्लाह का यह हमला वरिष्ठ कमांडर फुआद शुक्र की हत्या का बदला बताया जा रहा है. पिछले महीने इजरायल ने अपनी सैन्य कार्रवाई में फुआद शुक्र की हत्या कर दी थी.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की खबर के मुताबिक, हिजबुल्लाह ने संकेत देते हुए कहा है कि वह आगे और हमलों की योजना नहीं बना रहा है. दूसरी ओर इजरायल ने भी कहा है कि उनका देश पूर्ण पैमाने पर युद्ध नहीं चाहता है. हमास के साथ इजरायली जंग के बाद हिजबुल्लाह के साथ एक और मोर्चे पर सैन्य संघर्ष की आशंका महीनों से बनी हुई है. इसका ताजा प्रमाण रविवार को हुए हमलों में फिर दिखाई दिया.
हिजबुल्लाह की गिनती दुनिया के सबसे शक्तिशाली पावरफुल नॉन स्टेट एक्टर के रूप में की जाती है. अपने गठन के बाद से इस समूह ने इजरायल के लिए हमेशा मुसीबतें खड़ी की हैं. विदेशी मामलों के जानकार इसकी सैन्य क्षमताओं और लड़ाकुओं की फौज के कारण इसे इजरायल का नासूर बताते हैं.
अब बारी है लेबनान के इस चरमपंथी संगठन से जुड़ी हर बात जानने और समझने की
हिजबुल्लाह का मतलब है ईश्वर की पार्टी. थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) ने इसे दुनिया का सबसे भारी हथियारों से लैस पावरफुल नॉन स्टेट एक्टर बताया है. इसके पास बिना गाइडेड आर्टिलरी रॉकेट के साथ-साथ बैलिस्टिक, एंटीएयर, एंटीटैंक और एंटीशिप मिसाइलों का एक बड़ा जखीरा है. आधुनिक इतिहास में लेबनान 1943 तक फ्रांसीसी शासन के अधीन था.
फ्रांसीसी शासन की समाप्ति के बाद देश के महत्वपूर्ण आधिकारिक पद विशेष धार्मिक संप्रदाय के लोगों के लिए रिजर्व कर दिए गए. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन ( CFR) के मुताबिक, हिजबुल्लाह की असल उत्पत्ति लेबनानी सिविल वॉर (1975-1990) के दौरान हुई. यह विद्रोह बड़ी संख्या में देश में मौजूद सशस्त्र फिलिस्तीनी समूहों के असंतोष का परिणाम था.
लेबनान में आंतरिक जातीय और धार्मिक विभाजनों के बीच साल 1948 में इजरायली राज्य का गठन हो गया. इस गठन के बाद बड़े पैमाने पर लेबनान में फिलिस्तीनी शरणार्थियों का आगमन हुआ.
इसके बाद इजराइली सेना ने फिलिस्तीनी गुरिल्ला लड़ाकों को खदेड़ने के लिए साल 1978 और फिर साल 1982 में दक्षिणी लेबनान पर आक्रमण किया.
इजरायल के इस कदम के बाद यह तनाव और ज्यादा विस्तृत हो गया. इसी समय हिजबुल्लाह का गठन हुआ जो साल 1979 में ईरान में एक धर्मशासित इस्लामी सरकार के गठन से प्रेरित था.
ईरान और उसके इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने हिजबुल्लाह के प्रसार के लिए आर्थिक सहायता और मदद मुहैया कराई.
हिजबुल्लाह मिडिल ईस्ट में इजरायल और पश्चिमी प्रभाव का विरोध करता है. हिजबुल्लाह की स्थिति वेस्ट एशिया की दो प्रमुख शक्तियों और उनकी प्रतिद्वंद्विता को भी प्रदर्शित करती है.
वह है शिया बाहुल्य ईरान और सुन्नी बाहुल्य सऊदी अरब. अमेरिका इजरायल और सऊदी अरब का कट्टर सहयोगी है. वाशिंगटन का आरोप है कि ईरान हिजबुल्लाह को करोड़ों डॉलर की फंडिंग करता है और उसके पास हजारों लड़ाके हैं.
हिजबुल्लाह ईरान के एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस की कड़ी है जिसके सहारे वेस्टर्न पावर को कंट्रोल किया जाता है. एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस में हमास और हूती विद्रोही और इराक और सीरिया में मौजूद विद्रोही संगठन भी शामिल हैं.
पश्चिम एशिया की राजनीतिक मामलों के जानकार बताते हैं कि 2000 के दशक के मध्य में हिजबुल्लाह लेबनान की राजनीति में प्रवेश करने लगा. वर्तमान में देश की 128 सदस्यों वाली संसद में 13 सीटें उसके पास हैं.
वह अपने सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार चलाता है. बीते कुछ वर्षों के दौरान लेबनान में कई लोगों ने बढ़ती गरीबी, बेरोज़गारी और सरकारी कर्ज के बीच इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किया है
हिजबुल्लाह ने पिछले कई सालों से अपनी सैन्य क्षमताओं की सही जानकारी को साझा नहीं किया है. अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, दुनिया को उसकी सैन्य क्षमताओं के बारे में जो भी जानकारी है वह उसके नेता हसन नसरल्लाह के बयानों के जरिए मिलती है. नसरल्लाह का कहना है कि उनके लड़ाकों ने पिछले कुछ महीनों में किए गए हमलों में अपने हथियारों का एक छोटा हिस्सा ही इस्तेमाल किया है.
स्ट्रैटिजिक थिंक टैंक सीएसआईएस के अनुसार, हिजबुल्लाह के सैन्य जखीरे में मुख्य रूप से छोटे, मानव पोर्टेबल और अनगाइडेड आर्टिलरी रॉकेट्स की बड़ी संख्या है. हालांकि इन हथियारों में सटीकता की कमी है.
इजरायली सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2006 में इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच युद्द की समाप्ति के दिन उसके पास 15,000 रॉकेट और मिसाइलें थीं.
हिजबुल्लाह ने तब से लगातार अपनी सैन्य क्षमताओं में विस्तार ही किया है. रिपोर्ट के अनुसार, आज इसकी क्षमता करीब 1,30,000 रॉकेट और मिसाइलों की है. समूह के नेता ने बार-बार यह भी कहा है कि साल 2006 के युद्ध के बाद हिजबुल्लाह ने अपने शस्त्रागार में बड़ा परिवर्तन किया है. अब उसके हथियार सटीक हमला करने में सक्षम हैं.
अमेरिकी केंद्रीय खुफिया एजेंसी (CIA) की वर्ल्ड फैक्टबुक के अनुसार, साल 2022 तक हिजबुल्लाह के पास 45,000 लड़ाके हैं जिनमें 20,000 पूर्णकालिक तौर पर समूह में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
इसके अलावा समूह के पास ईरानी मॉडल वाले रॉकेट भी हैं. जैसे राद (अरबी में थंडर), फज्र (डॉन) और जिलजल (भूकंप) रॉकेट हैं जो कत्यूशा रॉकेट की तुलना में अधिक शक्तिशाली पेलोड ले जाने और लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम हैं.
CNN की एक रिपोर्ट के अनुसार, जिलजल-1 मिसाइल की रेंज 125-60 किमी है. इसके अलावा हिजबुल्लाह ने रूसी निर्मित एंटी टैंक कोर्नेट मिसाइल और ईरान की गाइडेड मिसाइल अल-मास का भी इस्तेमाल किया है.