India At UNSC: भारत के राजनेता दशकों से यह तर्क देते रहे हैं कि उनका देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) सदस्य बनने का हकदार है. एक महत्वाकांक्षी महाशक्ति के रूप में भारत का मानना है कि उसे अनुचित रूप से उच्च मंच पर स्थान देने से रोका किया गया है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों के लिए प्रयासरत कई विदेशी राजनेताओं और वैश्विक संगठनों ने भी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की उम्मीदवारी के लिए समर्थन व्यक्त किया है. हालाँकि, भारत द्वारा लगातार पैरवी के बावजूद विशेषज्ञ निकट भविष्य में बदलाव की कोई उम्मीद नहीं कर रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र में वीटो पावर हासिल करने से पहले भारत को इन प्रमुख चुनौतियों पर काबू पाना होगा.
कुछ दलों ने भारत को बिना वीटो शक्ति के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता मिलने की संभावना जताई है. यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस (यूएफसी) इटली के नेतृत्व वाला एक शक्तिशाली गठबंधन जिसमें कनाडा, मैक्सिको, स्पेन, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया और तुर्की जैसे अन्य सदस्य शामिल हैं जैसे समूहों ने महासभा के कामकाज को सुदृढ़ बनाने और अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की वकालत की है.
संगठन का तर्क है कि गैर-स्थायी सदस्यों को शामिल करने से सुरक्षा परिषद प्रभावी और प्रासंगिक बन जाएगा. समूह का तर्क है कि ऐसा करने से वैश्विक प्रणाली को संचालित करने में कुछ चुनिंदा देशों का प्रतिनिधित्व कम होगा. लेकिन इस बीच अहम सवाल यह है कि अगर भारत को वीटो पावर के बिना यूएन में उच्च पद मिल भी जाता है तो यह क्या शक्ति संतुलन की दिशा में ठीक स्थिति होगी. जानकारों का कहना है कि भारत इस तरह के प्रस्ताव से असहमत है. भारत का स्पष्ट रुख है कि सुरक्षा परिषद के सभी नए स्थायी सदस्यों के पास वीटो पावर होना चाहिए. ऐसे में इस बात की संभावना कम ही है कि वीटो पावर के बिना सदस्यता पर कोई भी सहमति बन पाए.
सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से चीन को छोड़कर सभी देश अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस ने अतीत में भारत की उम्मीदवारी का स्पष्ट समर्थन किया है. क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत का करीबी प्रतिद्वंद्वी होने के नाते चीन सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट वाला एकमात्र एशियाई राष्ट्र है जो भारत का समर्थन करने के लिए तैयार नहीं है. वीटो पावर हासिल करने से भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा में विस्तार होगा जो चीन भारत के साथ साझा नहीं करना चाहता है.
इसके अलावा वह भारत के साथ चल रहे सीमा विवाद के बीच सुरक्षा परिषद की सरंचना में किसी तरह के बदलाव का भी विरोध करेगा. चूंकि चीन, जापान से भी असहज है. जापान अमेरिका का करीबी सहयोगी है और भारत की तरह ही सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का प्रबल का दावेदार भी है.
हालांकि चीन ने एक माइंडगेम खेलते हुए अनौपचारिक रूप से संकेत दिए हैं कि वह भारत का समर्थन कर सकता है, बशर्ते भारत जापान का समर्थन न करे. भू-राजनीतिक मामलों के जानकारों के मुताबिक, चीन जानता है कि नई दिल्ली जी-4 ब्राजील, जर्मनी, भारत और जापान से मिलकर बना चार देशों का समूह है जो सुरक्षा परिषद में स्थायी सीटों के लिए एक-दूसरे की दावेदारी का समर्थन करते हैं. भारत इस एकता को नहीं तोड़ेगा इसलिए वह भारत को जापान के खिलाफ खड़ा करने को एक सुरक्षित दांव के रूप में देखता है.
अमेरिका ने सैद्धांतिक रूप से भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट दिलाने का समर्थन किया है लेकिन हर कोई यह नहीं मानता कि अमेरिकी नीति निर्माता वास्तव में इस सुधार का समर्थन करेंगे. इसके पीछे अमेरिका की अतीत की घटनाएं जिम्मेदार हैं जिसमें कई अहम मौकों पर अमेरिका अपने वादों से मुकर गया. इससे पहले पी-5 देशों ने वीटो पावर को लेकर वास्तविक निर्णय लेने की प्रक्रिया में बेहद दिखावटी और गैर-प्रतिबद्धता वाला रवैया अपनाया है. पूर्व अमेरिकी अवर सचिव (राजनीतिक मामलों) निकोलस बर्न्स ने साल 2008 में कहा था कि हम वीटो पावर को बनाए रखना चाहते हैं. हम यह अधिकार नए स्थायी सदस्यों को नहीं देना चाहते हैं.
अमेरिका में रहने वाले दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ एशले टेलिस ने हाल ही में फॉरेन अफेयर्स पत्रिका में एक लेख लिखा जिसमें तर्क दिया कि अमेरिका महत्वपूर्ण रणनीतिक मामलों में भारत के समर्थन के बारे में आश्वस्त नहीं हो सकता. एशले ने बाद में एक साक्षात्कार में इस स्थिति का बचाव करते हुए कहा कि यूक्रेन में मौजूदा युद्ध एक अच्छा उदाहरण है...भारत अपने हितों को ऐसे तरीकों से परिभाषित करता है जो हमेशा हमारे हितों के समान नहीं होते हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत ने पश्चिमी देशों की परवाह किए बिना अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई और रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदा. भारत ने यूएन में रूस के खिलाफ मतदान में हिस्सा न लेकर पश्चिमी देशों के सामने एक भरोसे का एक संकट पैदा किया है. इस वजह से कई लोग भारत को तटस्थ मानते हैं और इसे एक अविश्वसनीय भागीदार के रूप में देखते हैं.
पश्चिमी देश खास तौर पर रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद नई भू-राजनीतिक वास्तविकता के प्रति अधिक सतर्क हैं. अब उनकी यह समझ बदल गई है कि रूस अपने संघर्षों के लिए दुनिया में कोई समर्थन हासिल करने में विफल हो सकता है.पश्चिमी देशों के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध होने के बाद भी नई दिल्ली ने रूस पर प्रतिबंधों का समर्थन नहीं किया और न ही यूएन में रूस के खिलाफ कोई मतदान में हिस्सा लिया. पश्चिमी देश चीन से इस तरह की उम्मीद जरूर कर रहे थे लेकिन भारत के रवैये से उन्हें तगड़ा धक्का लगा है. बदलती भू-राजनीतिक स्थिति में यह कहना कठिन है कि अमेरिकी नेतृत्व में पश्चिमी देश शायद ही सुरक्षा परिषद में किसी सुधार के बावजूद भारत को वीटो शक्ति के रूप में स्वीकार करें.
भारत को अपने क्षेत्र से ही नेतृत्व के लिए कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. भारत इस क्षेत्र को प्रभावित करता है लेकिन पूर्ण रूप से नहीं. वास्तव में, जैसे-जैसे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी है, वैसे-वैसे नई दिल्ली की परेशानियाँ भी बढ़ी हैं.साउथ एशिया भारत-चीन प्रतिस्पर्धा का युद्धक्षेत्र बनता जा रहा है. वहीं, भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता सबसे अधिक वैश्विक ध्यान आकर्षित करती है. इसके अलावा भारत के सामने कई क्षेत्रीय चुनौतियां भी हैं. भारत वर्तमान में कूटनीतिक स्तर पर श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव और भूटान में चुनौतियों का सामना कर रहा है. हाल ही में बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन ने भारत के क्षेत्रीय नेतृ्त्व पर सवाल खड़ा कर दिया है.
वैश्विक मामलों के जानकारों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र को सुधार की सख्त जरूरत है खास तौर पर सुरक्षा परिषद को. सुरक्षा परिषद की सदस्यता में भारत जैसे विकासशील देशों को शामिल करने से संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को फायदा होगा. एक्सपर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली को स्थायी सदस्यता की अपनी मांग को और अधिक वैध बनाने और आलोचनाओं का समाधान करने के लिए अधिक ठोस प्रयास करने होंगे. साउथ एशिया में भारत के भौगोलिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. भारत को अपने मानव विकास सूचकांक में सुधार करने, आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे और बुनियादी ढांचे का अभाव भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचा रहा है. भारत को इन्हें दुरुस्त करने के प्रयास करने होंगे. इसके अलावा भारत को अपने दावे को और मजबूत करने के लिए इस क्षेत्र के साथ बेहतर जुड़ाव रखना होगा और अपने यहां बड़े पैमाने पर आंतरिक कार्य करने की आवश्यकता है.