Saudi US Petro-Dollar Deal: सऊदी अरब और संयुक्त राज्य अमेरिका यानी US के बीच रिश्तों में खटास बढ़ती जा रही है. दोनों देशों के बीच किसी न किसी विषय को लेकर दुनिया में चर्चा बनी रहती है. अमेरिका कई पर प्रतिबंध लगाता रहता है. हालांकि, अब सऊदी अरब ने बड़ा कदम उठाते हुए 50 साल पुरानी डील को तोड़ने का फैसला लिया है. सऊदी ने अमेरिका के साथ चली आ रही पेट्रोडॉलर डील को नवीनीकृत ना करने का फैसला लिया है. सबसे बड़ी बात ये की इस बीच सऊदी चाइना से बात तक रहा है.
टॉप इंडिया न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब ने खुद को 9 जून को समाप्त हुई 50 साल पुरानी पेट्रो-डॉलर डील के अलग कर लिया है. इस डील के तहत वर्ल्ड रिजर्व करेंसी का उपयोग कर तेल व्यापार किया जाता था. इसके बदले उसे अमेरिकी सऊदी अरब की सैन्य जरूरतें पूरी करता था. अब सऊदी अरब चीन के साथ तेल की बिक्री युआन में करने के लिए बातचीत कर रहा है. इससे वैश्विक पेट्रोलियम बाजार में अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को नुकसान होगा.
रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब अब चीनी तेल की बिक्री के लिए डॉलर के स्थान पर युआन लेने का विचार कर रहा है. इस संबंध में उसने चीनी सरकार से बात शुरू की है. हालांकि, बैकडोर में ये बात पिछले 6 साल से टल रही थी. इस फैसले के बाद वैश्विक पेट्रोलियम बाजार में अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व कम होने लगेगा. वहीं अन्य देशों के बीच व्यापार बढ़ेगा जो डॉलर का विकल्प खोज रहे थे.
- सऊदी अरब सुरक्षा के लिए अमेरिका के दशकों पुराने वादों से असंतुष्ट है
- सऊदी अरब द्वारा युआन को स्वीकार करना चीन की ओर झुकाव के रूप में देखा जा रहा है
- विशेषज्ञों की मानें तो इस से अमेरिकी-चीन प्रतिद्वंद्विता बढ़ेगी
- वैश्विक तेल बाजार में रेट तय करने के तरीकों में बदलाव होगा
- तेल अनुबंधों और कीमतों पर भी असर पड़ सकता है
- वैश्विक ऊर्जा बाजार की उभरती गतिशीलता और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मामलों में चीन का प्रभाव बढ़ेगा
पेट्रो-डॉलर डील 1973 के पेट्रोलियम क्राइसिस के बाद हुई थी. इसमें तय हुआ था कि सऊदी अरब अपने तेल निर्यात की कीमत अमेरिकी डॉलर लेगा और इसी में वो तेलों की कीमत तय करेगा. इससे आने वाले धन से वो अमेरिकी ट्रेजरी बांड खरीदेगा और इसके बाद अमेरिका उसकी सैन्य जरूरतों को पूरा करेगा. इस डील में सऊदी अरब ने अपनी आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा पाई वहीं अमेरिका को इससे विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित हो गई.