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माओवादी हैं राजशाही और हिंदू राष्ट्र के आंदोलन के पीछे, नेपाल की राजनीति में बड़ा ट्विस्ट आया सामने

नेपाल में राजतंत्र की वापसी का आंदोलन सिर्फ एक राजनीतिक संघर्ष नहीं है, बल्कि यह देश की आस्थाओं, पहचान और भविष्य की दिशा से जुड़ा हुआ है. इस संघर्ष में दुर्गा प्रसाई का नेतृत्व और उनके विचार नेपाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ ला सकते हैं.

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Edited By: Mayank Tiwari
नेपाली व्यवसायी दुर्गा प्रसाई
Courtesy: X@ImDurgaPrasai

नेपाल में इन दिनों राजतंत्र के समर्थकों का आंदोलन तेज हो गया है, जो देश में फिर से राजा की सत्ता की वापसी की मांग कर रहे हैं. यह आंदोलन 2008 के बाद से सबसे बड़ा और स्थायी आंदोलन बन चुका है, जब नेपाल ने हिन्दू राष्ट्र होने के साथ-साथ राजतंत्र को समाप्त कर दिया था. दरअसल, इस शुक्रवार (28 मार्च) को काठमांडू में हुए हिंसक प्रदर्शनों में तीन लोग मारे गए और सैकड़ों को गिरफ्तार किया गया.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ये आंदोलन विशेष रूप से इस कारण चर्चित है क्योंकि इसे एक पूर्व माओवादी उग्रवादी, दुर्गा प्रसाई, नेतृत्व दे रहे हैं. माओवादियों के समर्थन से ही 2008 में राजा ज्ञानेन्द्र शाह को सिंहासन छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था.

राजतंत्र समर्थक आंदोलन की बढ़ती ताकत

प्रसाई का यह आंदोलन उस असंतोष का परिणाम है, जो नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार से पैदा हो रहा है. नेपाल ने 2008 के बाद से 17 सालों में 13 सरकारों को देखा है, और इस बीच यह आंदोलन सरकार के प्रति बढ़ते असंतोष का प्रतीक बन चुका है.

दुर्गा प्रसाई: माओवादी से राजतंत्रीवादी नेता  

दुर्गा प्रसाई, जोकि पेशे से एक डॉक्टर और कारोबारी हैं, एक समय माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड के सहयोगी रहे थे. हालांकि, अब वह नेपाल में राजतंत्र की वापसी का प्रमुख चेहरा बन चुके हैं. प्रसाई ने हाल ही में संसद भवन की ओर अपनी कार से धावा बोलकर पुलिस बैरिकेड्स तोड़ दिए थे. इस समय वह पुलिस की गिरफ्त से फरार चल रहे हैं और काठमांडू के एक मंदिर में छिपे हुए हैं. उनका कहना है कि वह देश छोड़कर नहीं गए हैं और उन्हें पकड़ने के लिए चल रही कार्रवाई पूरी तरह गलत है.

प्रसाई का नेतृत्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वह माओवादी विचारधारा से राजतंत्र समर्थक बन गए हैं और उन्होंने खुले तौर पर ओली सरकार को चुनौती दी है. उनका यह बयान कि वे नेपाल को हिन्दू राज्य के रूप में पुनः स्थापित करेंगे, ने उन्हें नेपाली राजनीति में एक नई दिशा दी है.

नेपाल में राजतंत्र की वापसी की सत्तारूढ़ भावना

नेपाल ने 2008 में हिंदू राजतंत्र को समाप्त करके एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की स्थापना की थी. हालांकि, अब देश में फिर से राजा की वापसी की मांग उठ रही है. वहीं, मार्च 2025 में पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह के काठमांडू लौटने के बाद, लगभग 4 लाख लोगों ने "राजा वापस आओ, देश को बचाओ" जैसे नारे लगाकर रैली निकाली थी. इस रैली में प्रचंड द्वारा समर्थित माओवादी युद्ध के बाद शाही परिवार के खात्मे के खिलाफ विरोध का नया मोर्चा देखा गया.

नेपाल में राजतंत्र को खत्म करने के पीछे 1996-2006 तक चले माओवादी विद्रोह का हाथ था, जो कि चीन के समर्थन से पैदा हुआ था. लेकिन आजकल, भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट के कारण लोग शाही व्यवस्था को एक स्थिर विकल्प मानने लगे हैं.

जानिए कैसा रहा है दुर्गा प्रसाई का राजनीतिक सफर?

दुर्गा प्रसाई का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था. वह एक गरीब किसान परिवार में जन्मे थे और उनके पास केवल आठवीं कक्षा तक की शिक्षा थी. पहले भैंस पालन में असफल होने के बाद, उन्होंने राजनीति में कदम रखा. माओवादी आंदोलन के दौरान वह प्रचंड के करीबी साथी बने और कई युद्धरत माओवादी सेनानियों को शरण भी दी. बाद में उन्होंने नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के साथ भी तालमेल किया.

हालांकि, 2022 में पार्टी से निष्कासन के बाद, प्रसाई ने भाजपा के समान राष्ट्रवादी विचारों को अपनाया और राजतंत्र की वापसी का अभियान शुरू किया. अब वह नेपाल में एक प्रमुख राजतंत्रीवादी नेता के रूप में उभर रहे हैं और उनकी रैलियों में हजारों लोग शामिल हो रहे हैं.

नेपाल के भविष्य पर उठ रहे सवाल

प्रसाई की राजतंत्र समर्थक आंदोलन को लेकर बढ़ती प्रभावशीलता ने नेपाल की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है. क्या नेपाल अपने इतिहास के पुराने पन्नों को पलटते हुए फिर से राजतंत्र की ओर बढ़ेगा? या फिर प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों पर बने रहेंगे? यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है.