Waqf Amendment Bill: भारत सरकार ने वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 को लोकसभा में प्रस्तुत करने की योजना बनाई है. यह विधेयक बुधवार को लोकसभा में प्रस्तुत किया जाएगा. केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने मंगलवार को यह घोषणा की कि विधेयक प्रश्नकाल के बाद पेश किया जाएगा, और इसके बाद 8 घंटे तक इस पर चर्चा होगी. यदि आवश्यक हुआ तो इस चर्चा की अवधि को बढ़ाया भी जा सकता है.
वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना है. यह विधेयक विशेष रूप से उन मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए लाभकारी है, जिन्हें लंबे समय से वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में अधिकार से वंचित रखा गया है. केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस विधेयक के बारे में पार्टी के प्रवक्ताओं से कहा कि यह मुस्लिम समुदाय को, विशेषकर गरीबों को, वक्फ संपत्तियों का सही लाभ दिलवाने के लिए लाया जा रहा है. उनका यह भी कहना था कि इस विधेयक का उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करना नहीं है.
भारत सरकार ने वक्फ (संशोधन) विधेयक के पक्ष में कौन-कौन?
केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने भी इस विधेयक का समर्थन किया और विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह मुस्लिम समुदाय को गुमराह कर रहा है. उनका कहना था कि यह विधेयक वक्फ संपत्तियों पर काबिज कुछ विशेष व्यक्तियों से हटाकर गरीब मुसलमानों को इसका सही लाभ दिलवाएगा.
इसके अलावा, केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (KCBC) ने भी इस विधेयक के पक्ष में बयान जारी किया है. उन्होंने सांसदों से वक्फ कानून के "असंवैधानिक" प्रावधानों में संशोधन करने का आग्रह किया है और वक्फ जमीन पर अवैध दावों के खिलाफ कदम उठाने की आवश्यकता को महसूस किया है. टीडीप ने अपना स्टैंड क्लियर करते हुए कहा कि यह मुस्लिमों के हित में है.
क्या कहना है इस विधेयक का विरोध करने वालों का
विपक्षी दल इस विधेयक के खिलाफ मुखर हो गए हैं. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसे "वक्फ बर्बाद बिल" करार दिया है. उनका कहना है कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 का उल्लंघन करता है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्यों एनडीए के सहयोगी नेता जैसे नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू और चिराग पासवान इसे समर्थन दे रहे हैं.
समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने भी इस विधेयक का विरोध किया और भाजपा पर वक्फ बोर्ड के मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया. कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद पी. संडोश कुमार ने इस विधेयक को भारतीय धर्मनिरपेक्षता पर हमला बताया, जबकि कांग्रेस के सांसद जयराम रमेश ने इसे संविधान पर सीधे हमला करार दिया. उन्होंने सरकार पर इसे बिना पर्याप्त चर्चा के संसद की संयुक्त समिति से पास करवाने का आरोप लगाया.
कैसा है लोकसभा और राज्यसभा में नंबर गेम?
विधेयक का पारित होना मुख्य रूप से लोकसभा और राज्यसभा में समर्थन की ताकत पर निर्भर करेगा. लोकसभा में एनडीए के पास 293 सांसद हैं, जिनमें 240 बीजेपी के हैं. साथ ही एनडीए के सहयोगी दलों जैसे जद(यू), टीडीपी, एलजेपी, आरएलडी और शिवसेना का समर्थन भी विधेयक को पारित करने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि 272 सांसदों का बहुमत आवश्यक है.
राज्यसभा में एनडीए के पास 123 सांसद हैं, जिनमें 98 बीजेपी के सदस्य हैं. सहयोगी दलों का समर्थन यहां भी एनडीए को कुछ हद तक बढ़त दिलवाता है, लेकिन राज्यसभा में विधेयक को पारित करने के लिए 119 सांसदों का समर्थन जरूरी है.
चूंकि एनडीए के पास दोनों सदनों में पर्याप्त बहुमत है, इसलिए यह विधेयक पारित होने की संभावना है. हालांकि, विधेयक के वोटिंग के समय एनडीए गठबंधन की एकजुटता और विपक्षी दलों द्वारा उठाए गए मुद्दों का समाधान करना अहम होगा.