महिलाओं के लिए आसान नहीं है पीरियड लीव, सुप्रीम कोर्ट को भी नजर आई दिक्कत, केंद्र से कही ये बात
महिलाओं को मासिक धर्म की अवधि के दौरान छुट्टी मिलनी चाहिए या नहीं, इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. यह ऐसा अधिकार है, जो महिलाओं के लिए वरदान की तरह होगा. उन्हें कम से कम तीन दिनों की छुट्टी मिलनी चाहिए, इसे लेकर एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई. कोर्ट ने इसे ठीक माना लेकिन यह भी कहा है कि सरकार और राज्य सरकारें ही तय करें कि इसे लेकर कोई नीति बनाई जा सकती है, या नहीं. पढ़ें पूरा केस.
महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान छुट्टी देना, उनका नुकसान करा सकता है. ये फैसला उनकी मुश्किलें बढ़ा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए मेंस्ट्रुअल लीव पर केंद्र और राज्य सरकारों से एक पॉलिसी बनाने के लिए कहा है. जस्टिस DY चंद्रचूड़ नेकहा, 'ऐसी छुट्टियों को अनिवार्य करने पर महिलाओं की कार्यस्थल पर चुनौती बढ़ सकती है. हम ये नहीं चाहते, हम महिलाओं की सुरक्षा करना चाहते हैं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यह दरअसल एक सरकारी नीति है, इसमें कोर्ट इसके लिए नहीं है. कोर्ट ने कहा है कि यह फैसला कई योजनाओं से जुड़ा है, इस वजह से कोर्ट को इसमें दखल देने का कोई कारण नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'हम याचिकाकर्ता को महिला एवं विकास मंत्रालय के सचिव और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एश्वर्य भाटी के पास जाने की इजाजत देते हैं. हम सचिव से अनुरोध करते हैं कि इस मामले को देखें और पॉलिसी स्तर पर इस पर निर्णय लें. इसमें सभी पक्षों से वार्ता करें और तब देखें क्या इस पर नीति बनाई जा सकती है.'
कोर्ट ने केंद्र सरकार से क्या कहा है?
कोर्ट ने कहा है कि यह रूलिंग किसी राज्य सरकार के आड़े नहीं आएगी, जो इस पर काम करना चाहते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में भी इसी साल कहा था कि मेंस्ट्रुअल पेन लीव पर राज्य सराकरों को नीति बनानी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि अब यह मामला नीति निर्माताओं के पास है. बिहार और केरल सरकार, केवल दो राज्य ऐसे हैं, जहां मेंस्ट्रुअल लीव की व्यवस्था है. बिहार में दो दिन और केरल में 3 दिन का पीरियड डे लीव महिला छात्राओं के लिए है.
मेंस्ट्रुअल लीव पर क्या कहती हैं महिला अधिवक्ता?
मेंस्ट्रुअल लीव पर बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रुपाली पंवार बताती हैं कि अगर कोई जरूरतमंद है तो उसे मेन्स्ट्रुअल लीव मिलना चाहिए. यह पूरी तरह से ऐच्छिक होना चाहिए कि कौन लीव चाहता है या नहीं. कुछ महिलाओं में पीरियड के दिनों में ज्यादा दर्द होता है, उन्हें ऐसे लीव की जरूरत पड़ती है. कुछ महिलाएं, इन दिनों में भी सामान्य रहती हैं. ऐसे में इस पर फैसला, संसद से ही आना चाहिए, कोर्ट से नहीं. कोर्ट नीति नियंता नहीं है, नीतियों की समीक्षा का अधिकार कोर्ट का है.
क्या हैं मेन्स्ट्रुअल लीव की चुनौतियां?
- कार्यस्थल पर महिलाओं को इससे दिक्कत हो सकती है. लोग महिलाओं को नियुक्त करने से बच सकते हैं.
- कार्यस्थल पर लीव को लेकर पुरुष साथी सवाल खड़े कर सकते हैं.
- कोर्ट को भी चिंता है कि अगर इसे अनिवार्य कर दिया जाए तो महिलाओं को नौकरी देने से बचेंगे.
- इसे अनिवार्य करने के लिए व्यापक सुधारों की जरूरत पड़ेगी. महिलाओं की उम्र से लेकर उनके मोनोपॉज तक की सटीक ट्रैकिंग करनी पड़ेगी, जिससे इसका अनुचित लाभ न कोई ले सके.
- बिना राज्य सरकारों की रजामंदी के, स्टेक होल्डर्स की मर्जी के बिना अगर इस पर कोई कानून बनता है तो इसके लागू होने में दिक्कतें आएंगी.