Soldier Widow Story: कारगिल युद्ध में अपने पतियों को खोने के बाद कई विधवाओं संघर्ष का सामना करना पड़ा. संकट के समय में उनकी मदद करने के बजाय सरकारी कार्यालयों में उन्हें अधिकारियों ने गंदी नजर से देखा. कारगिल युद्ध में शहीद हुए बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) के निरीक्षक इंद्रजीत सिंह की विधवा, इंदु सिंह ने अपने संघर्ष की कहानी को शेयर किया है. उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए बताया कि जब वो जमीन संबंधि मदद मांगने के लिए अधिकारी के पास पहुंची तो उनके साथ गलत व्यवहार हुआ. आइये जानें देश के लिए सब खोने वाली महिला को किन-किन चीजों का सामना करना पड़ा.
निरीक्षक इंद्रजीत सिंह 129 बटालियन में तैनात थे. 28 जून 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान वो शहीद हो गए. उन्हें जम्मू और कश्मीर के हलमतपोरा जंगल से 6 किलोमीटर दूर कुपवाड़ा सेक्टर में आतंकवादियों की गोली मार दी थी. इंदरजीत सिंह ने आखिरी सांस तक आतंकियों का मुकाबला किया था. अब उनकी विधवा इंदु सिंह ने पति के जाने के बाद अपने संघर्ष की कहानी टाइम्स ऑफ इंडिया से साझा की है.
हरियाणा के रोहतक में बस चुकीं इंदु सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश के एक अधिकारी ने गलत नियत से उनके पैरों से छुआ था. उस अधिकारी को उनके गांवों में स्मारक के निर्माण के लिए भूमि आवंटन का काम सौंपा गया था. उस अधिकारी के खिलाफ उनको 2001 में तत्कालीन गृहमंत्री एलके आडवाणी के पास भी जाना पड़ा था. उन्होंने आडवाणी की हस्तक्षेप के बाद उसे निलंबित कर दिया गया. इंदु के अनुसार, कई अन्य युद्ध विधवाओं ने अधिकारी रवैये के बारे में गृहमंत्री से संपर्क किया था.
इंदु सिंह ने बताया कि अधिकारी विधवाओं को अपने पास बैठने के लिए मजबूर करता था. वो उन्हें घंटों तक रुकने के लिए मजबूर करता था और डबल मीनिंग बातें करता था. इन सभी चीजों का सामना मेरे पति के गुजरने के कुछ समय बाद तक मेरे को करना पड़ा. हालांकि, मैं पढ़ी लिखी थी इस कारण इसका विरोध कर पाती थी लेकिन बड़ी संख्या में विधवाओं को परेशान किया जाता था.
अधिकारियों ही नहीं उन्हें परिवार से भी कई तरह के दबाव का सामना करना पड़ता था. इंदू के अनुसार, उनको बागपत में अपने पति के संयुक्त परिवार में "रुपया" (मृत पति के भाइयों से विवाह करने की प्रथा) के लिए दबाव डाला गया. उस समय उनको काफी तकलीफ हुई क्योंकि वो दो बच्चों की मां थी. तब उन्होंने अपने ससुराल से कह दिया की बाकी जिंदगी वो अपने शहीद पति की यादों के साथ बिता लेंगी और बागपत को छोड़ रोहतक में बसने का फैसला लिया.
इंदु ने बताया कि उनको सरकार की नीति के अनुसार पेट्रोल पंप मिल सका. हालांकि, इसे पाने के लिए उनको राज्य सरकार और गृह मंत्रालय से इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन तक शटलिंग करना पड़ा. इसके बाद उनकी लड़ाई 2007 में समाप्त हुई और रोहतक में उनको एक पेट्रोल पंप आवंटित किया गया. संघर्ष के दौरान उन्हें अकेले ऑफिस के चक्कर लगाने पड़े जहां अधिकारियों ने उनपर गंदी नजर से देखा और नैतिकता को किनारे रख दिया.
इंदू सिंह अब भी अपने ससुराल से अलग रोहतक में रह रही हैं. उनके बेटे पेट्रोल पंप चलाने में उनकी मदद करते हैं. अब इंदू की उम्र 60 साल हो गई है. वो साल में एक बार अपने पति के मूल स्थान में हवन करने के लिए बागपत जरूर जाती हैं.