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धारा 370 के खत्म होने से लेकर पाकिस्तान की कमजोरी तक, 5 कारण जिसके चलते घाटी में कम हो गई है हिंसा

5 Reasons to Low Down Violence in Jammu Kashmir: जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के जरिए स्पेशल स्टेटस को खत्म हुए लगभग 5 साल पूरे होने वाले हैं जिससे पहले यह बहस छिड़ी हुई है कि आखिर क्यों पिछले कुछ सालों में पहले की तुलना में हमले कम हो गए हैं. सबसे महत्वपूर्ण बदलाव शीर्ष से एक नया राजनीतिक स्वर है - हमें आधुनिक होने के लिए पश्चिमी होने की ज़रूरत नहीं है, हम आतंकवाद के लिए जीरो टॉलरेंस रखते हैं, और भारत एक विकसित देश होना चाहिए। भारत की नरम और कठोर शक्ति पाकिस्तान की नियत (इरादे), कैलकुलेशन और विकल्पों को बदल रही है.

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Edited By: India Daily Live
Jammu kashmir
Courtesy: IDL

5 Reasons to Low Down Violence in Jammu Kashmir: 1989 से कश्मीर में आतंकवाद से लड़ते हुए 1608 जम्मू और कश्मीर पुलिस, 511 सीआरपीएफ जवानों और हजारों अन्य सुरक्षा बलों के वीर जवान शहीद हो चुके हैं जिन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करना हमारा कर्तव्य है. उनकी शहादत को याद रखने का सबसे सही तरीका जम्मू और कश्मीर में 2019 से लगातार आतंकवाद के ग्राफ को देखना है.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की लाइनें "क़त्ल गाहों से चुन कर हमारे आलम, और निकलेंगे उषाक़ के क़ाफ़िले (शहीदों के हाथों से झंडे लेकर देशभक्तों का कारवां निकलेगा)" हमें याद दिलाती हैं कि इन वीर जवानों के बलिदान का सबसे बड़ा सम्मान है घाटी में आतंकवाद में कमी. ऐसे में आइये समझने की कोशिश करते हैं कि जम्मू-कश्मीर में पिछले 5 सालों में लगातार आ रही हिंसा की घटनाओं में गिरावट का कारण क्या है-

1. आर्टिकल 370 का खात्मा

जम्मू और कश्मीर के नेताओं ने "धर्मो रक्षति रक्षितः" (व्यवस्था उनका रक्षा करती है जो व्यवस्था की रक्षा करते हैं) के महाभारत के उपदेश को नजरअंदाज कर दिया था. विशेष संवैधानिक दर्जा होने के कारण वे जो कहते थे और जो करते थे उसमें अंतर था. अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण 1950 के दशक में संसद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आह्वान "एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे" का जवाब है.

यह अनुच्छेद जम्मू और कश्मीर की राजनीति को पुरानी, वंशवादी और ठहरा हुआ बनाने में बहुत योगदान देता था. 1996, 2002, 2008 और 2014 के चुनावों में जीत के साथ भरे हुए दिलों की आशाओं को हम याद करते हैं, लेकिन हमें निराशा ही हाथ लगी. भविष्य के जम्मू और कश्मीर चुनाव भारतीय संविधान के तहत होंगे और उनमें नई चुनावी सीमाएं, वोटिंग स्ट्रक्चर और मायने होंगे.

यह निरस्तीकरण उन नए राजनेताओं और पार्टियों को मदद करता है जो लोकतंत्र के "सभ्य गृहयुद्ध" का इस्तेमाल करते हुए टकराव को समझौते में बदल देते हैं, जिससे जुनून कम होता है, हितों का निर्माण होता है और समझौता होता है.

2. सीमा पार सैन्य हमले- सर्जिकल स्ट्राइक से जवाब

पाकिस्तानी सेना का मानना था कि परमाणु बमों का परीक्षण करने के बाद भारत द्वारा सीमा पार सैन्य हमले असंभव थे. लेकिन उरी और पुलवामा की घटनाओं के जवाब ने जम्मू और कश्मीर में सुरक्षा नेतृत्व की आतंकवादियों का पीछा करने की दशकों पुरानी प्रार्थनाओं का उत्तर दिया. ये प्रार्थनाएं युद्ध-प्रचार नहीं थीं, बल्कि यह सहमति कि पाकिस्तान का आतंक कारखाना बिना नई रणनीति के पीछे नहीं हटेगा. 2001 में जम्मू और कश्मीर विधानसभा पर हमले के लिए कोई परिणाम नहीं हुआ, जिसके कारण 2001 में भारतीय संसद और 2008 में मुंबई पर बड़े हमले हुए.

इन हमलों ने पाकिस्तानी सेना के गुरुत्वाकर्षण रहित दुनिया के वादे को कमजोर कर दिया. उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता थॉमस शेलिंग की किताब "स्ट्रैटेजीज़ ऑफ़ कन्फ्लिक्ट" को असल रूप दिया, जिसने भविष्य के दुख के वादे की उपयोगिता को उजागर किया. भारत के सर्जिकल स्ट्राइक आंतरिक सुरक्षा रणनीति पर नए नियमों और परिणामों का संकेत देते हैं.

3. कट्टरपंथी इस्लाम की ग्लोबल एक्सेप्टेंस

अमेरिका के लिए अफगानिस्तान में सोवियत संघ से लड़ने के लिए मुजाहिदीन को तैयार करने में "जिहाद" का झूठा नरेटिव उपयोगी था. लेकिन जाहिर है, सीआईए ने भस्मासुर की कहानी के बारे में नहीं सुना था, वह राक्षस जिसे आप पैदा करते हैं और जो आप पर ही हावी हो जाता है. यह सिर्फ समय की बात थी कि कट्टरपंथी इस्लाम और वहाबवाद पश्चिम की ओर अपनी नजर घुमाए जिसके शुरुआती संकेत भी मिले थे.

1990 के दशक की अमेरिकी राष्ट्रीय खुफिया परिषद की रिपोर्ट में इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई को तब तक अव्यवहारिक माना गया था खासतौर से तब तक जब तक कि वो उनकी घरेलू सरजमीं पर त्राहिमाम कराने वाला न हो.

घरेलू जमीन पर अमेरिका पर हमला करने की आतंकवादियों की योजनाओं के बारे में हमारी चेतावनियों को स्वार्थ के रूप में खारिज कर दिया गया था और आतंक के बुनियादी ढांचे और पाकिस्तान के इरादों के बारे में उनकी अज्ञानता लापरवाही थी. दुर्भाग्य से, अमेरिका पर 9/11 के हमलों में ही कट्टरपंथी इस्लाम के खतरों को पहचानने और आतंकवाद को हवा देने वाले ग्लोबल फाइनेंसिंग, प्रचार और हथियारों के ट्रेड पर लगाम लगाने के लिए प्रेरित किया. सीमा पर आतंकवाद को लेकर भारत का रूख अब अकेला या अनोखा नहीं रखा जिससे पाकिस्तान की रणनीति अस्थिर हो जाती है.

4. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की बढ़ती कमजोरी

1960 के दशक में पाकिस्तान के साथ हुए डिफेंस पैक्ट्स, 1970 के दशक में अमेरिका-चीन के बीच की सुलह कराने में उपयोगिता और 1980 के दशक में अफगान मुजाहिदीन समर्थन के साथ वैश्विक स्तर पर कद बढ़ा था लेकिन 9/11 के अमेरिकी आतंकवादी हमलों और उसमें ओसामा बिन लादेन की भूमिका, बाद में उसका पाकिस्तानी सरजमीं पर मिलना और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते कॉम्पिटिशन ने पाकिस्तान का जियो पॉलिटिकल प्रभाव कम कर दिया है.

आर्थिक रूप से लगातार कमजोर हो रहे पाकिस्तान और इनकॉम्पिटेंट मिलिट्री स्टेट की ओर से इस्लाम को हथियार बनाकर आम लोगों की खुशियों को खत्म करने के चलते आंतरिक गुस्सा भी बढ़ा है. पाकिस्तान का प्रति व्यक्ति जीडीपी बांग्लादेश से कम है और कुल जीडीपी महाराष्ट्र से भी कम हो गया है. मिलिट्री स्टेट के पॉलिटिकल और सोशल कंट्रोल डिवाइस मजबूत हैं. पाकिस्तान में लोकतंत्र तो है पर उसमें नॉर्मलेसी नहीं है और देश में बढ़ रही लगातार आंतरिक कमजोरी उसे बाहरी खतरों से बचने की क्षमता को कमजोर बनाते हैं. 

5. भारत का ग्लोबल पावर के तौर पर उदय होना

1947 के बाद भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाया, लेकिन सामूहिक समृद्धि लाने में असफल रहा. यह अब बदल रहा है. भारत के बौद्धिक, सुरक्षा, वित्तीय, कूटनीतिक, निवेश, कल्याण और आर्थिक बुनियादी ढांचे को आधुनिक करने की लहर जोर पर है. भारत अब पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जल्द ही चीन और अमेरिका के बाद तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. हाल के वर्षों में, हमने सऊदी अरब के साथ तेल से ज्यादा सॉफ्टवेयर का निर्यात किया है; इससे हमारी सेना को एक डिजिटल दुनिया में एक बड़ा फायदा मिलता है.