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'वर्जिनिटी टेस्ट के लिए महिला को नहीं कर सकते फोर्स, अनुच्छेद 21 का है उल्लंघन', हाई कोर्ट ने सुना दिया अहम फैसला

Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ ने एक फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी महिला को वर्जिनिटी टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है.

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Edited By: Gyanendra Tiwari
Chhattisgarh HC No woman can be forced to undergo her virginity test right to dignity under Article
Courtesy: Social Media

Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि महिला को वर्जिनिटी टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि ऐसा कोई भी प्रयास भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा. अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, जिसमें सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है.

हाई कोर्ट ने इस फैसले में जोर देते हुए कहा कि वर्जिनिटी टेस्ट जैसी प्रक्रिया महिलाओं के मौलिक अधिकारों, विशेषकर उनकी गरिमा के अधिकार के खिलाफ है. कोर्ट ने कहा कि यह अधिकार महिलाओं को सम्मानजनक तरीके से जीने का हक देता है, और यह अधिकार किसी भी परिस्थिति में छीना नहीं जा सकता.

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का आदेश

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा ने यह आदेश तब दिया जब एक पुरुष ने अपनी पत्नी के वर्जिनिटी टेस्ट की मांग की थी. उसने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी का किसी अन्य पुरुष के साथ अवैध संबंध है और इस कारण उसे वर्जिनिटी टेस्ट करवाना चाहिए. यह मामला परिवार न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ था, जिसमें पत्नी के वर्जिनिटी टेस्ट की मांग को खारिज कर दिया गया था.

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पति अपनी पत्नी के बारे में लगाए गए आरोपों को गलत साबित करना चाहता है, तो वह अन्य चिकित्सा परीक्षण करवा सकता है या अन्य साक्ष्य पेश कर सकता है. लेकिन वह अपनी पत्नी को वर्जिनिटी टेस्ट के लिए मजबूर नहीं कर सकता.

महिला के अधिकारों की रक्षा

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी महिला अपने व्यक्तिगत सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार रखती है. वर्जिनिटी टेस्ट की मांग महिला के अधिकारों का उल्लंघन है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित हैं. यह कोर्ट का मानना था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार गैर-परिवर्तनीय है और इसे किसी भी स्थिति में नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता.

किस मामले में हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला

यह मामला एक दंपति के बीच का था, जिन्होंने 30 अप्रैल 2023 को हिंदू रिवाजों से शादी की थी. पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने अपने परिवार को बताया कि वह शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थ है. इसके बाद, पत्नी ने 2 जुलाई 2024 को परिवार न्यायालय में एक आवेदन दायर किया, जिसमें उसने अपने पति से 20,000 रुपये का भत्ता मांगा.

पति ने इस आवेदन का विरोध करते हुए यह आरोप लगाया कि उसकी पत्नी का भाई के साथ अवैध संबंध है और विवाह कभी पूरा नहीं हुआ. इसके बाद, परिवार न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया और पति ने उच्च न्यायालय में इस फैसले को चुनौती दी.

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रकार के मामले में दोनों पक्षों के आरोपों का मूल्यांकन साक्ष्य के आधार पर ही किया जा सकता है. कोर्ट ने यह निर्णय लिया कि परिवार न्यायालय का आदेश सही था और इसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं थी.