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India Daily

केंद्र सरकार का SC में जवाब, दोषी जनप्रतिनिधियों पर आजीवन प्रतिबंध का किया विरोध

केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के विवादित प्रावधान “आनुपातिकता और तर्कसंगतता” के सिद्धांतों पर आधारित हैं.

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Edited By: Mayank Tiwari
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
Courtesy: Social Media

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका का विरोध किया है, जिसमें दोषी ठहराए गए कानून निर्माताओं को चुनाव लड़ने पर जीवनभर का प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी. इस दौरान केंद्र सरकार ने कहा है कि इस तरह के प्रतिबंध में कुछ भी असंवैधानिक नहीं है, क्योंकि सजा की अवधि को सीमित करने से अवरोध सुनिश्चित किया जा सकता है. 

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से पेश एक हलफनामे में कहा कि प्रतिनिधित्व जनप्रतिनिधियों के चुनाव (प्रस्ताव 1951) अधिनियम की उन प्रावधानों में कोई समस्या नहीं है, जो दोषी ठहराए गए विधायकों को जेल की सजा पूरी करने के छह साल बाद तक चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करती हैं.

दोषी ठहराए गए विधायकों के लिए प्रतिबंध की अवधि क्या होनी चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के जवाब में केंद्र ने इसे "समानता और उचितता" के सिद्धांतों पर आधारित बताया और कहा कि संसद को यह तय करने का अधिकार है कि दोषी ठहराए गए विधायकों के लिए प्रतिबंध की अवधि क्या होनी चाहिए.

याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या दी प्रतिक्रिया?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर 10 फरवरी को एक आदेश जारी किया था, जिसमें सवाल उठाया गया था कि केवल 6 साल तक प्रतिबंध क्यों लगाया गया है, जबकि यह स्थिति विधायकों के लिए एक "संघर्ष में हितों का टकराव" पैदा करती है. याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका में, 1951 के प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 और 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी. धारा 8 के तहत, दोषी ठहराए गए विधायक चुनाव में छह साल तक हिस्सा नहीं ले सकते हैं यदि उनकी सजा दो साल या उससे अधिक की है.

विधायकों के खिलाफ मामलों का लंबित रहना चिंता का विषय

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि संसद में विधायकों के खिलाफ हजारों आपराधिक मामले लंबित हैं, जो राजनीति में अपराधीकरण की गंभीर समस्या को दिखाता है. कोर्ट ने चुनाव आयोग से भी इस पर अपनी स्थिति साफ करने को कहा और खासतौर पर यह मुद्दा उठाया कि विशेष एमपी/एमएलए कोर्ट में इन मामलों की सुनवाई की गति बहुत धीमी है.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दिया तर्क

केंद्र ने यह भी कहा कि किसी भी सजा को लागू करने में संसद हमेशा "समानता और उचितता" बनाए रखने का प्रयास करती है. इस याचिका में अंतर केवल इस बात का है कि सजा की अवधि को 6 साल से बढ़ाकर जीवनभर कर दिया जाए. केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 के तहत जो विधायकों के अयोग्यता के कारणों की बात की गई है, वे स्थायी नहीं हैं और एक बार जब शर्तें पूरी हो जाती हैं, तो अयोग्यता समाप्त हो जाती है.

सुप्रीम कोर्ट 4 मार्च को करेगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 4 मार्च को तय की है, जिसमें अटॉर्नी जनरल आर. वेणकटरामानी को मामले में सहायता देने के लिए कहा गया है. इस मामले में कोर्ट की जांच यह सुनिश्चित करने के लिए भी होगी कि 2015 के सार्वजनिक हित मामले में दिए गए आदेश का ठीक से पालन हो रहा है या नहीं, जिसमें सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों का एक साल के भीतर निपटारा करने का निर्देश था.